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भारतीय धर्म और दर्शन Bharatiy Dharm Aur Darshan

Q.भारतीय दर्शन की प्रमुख विशेषता क्या है?

Ans.आस्तिक दर्शन छ: हैं जिन्हें न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त कहा जाता है। … एक ही देश में पनपने के कारण इन दर्शनों पर भारतीय प्रतिभा, निष्ठा और संस्कृति की छाप अमिट रूप से पड़ गई है। इस प्रकार भारत के विभिन्न दर्शनों में जो साम्य दिखाई पड़ते हैं, उन्हें “भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताएँ” कहा जाता है।

Q.भारतीय दर्शन में व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य क्या है?

Ans.लक्ष्य भी आरम्भ से ही दो प्रकार के थे-धन का उपार्जन तथा ब्रह्म का साक्षात्कार। प्रज्ञामूलक और तर्क-मूलक प्रवृत्तियों के परस्पर सम्मिलन से आत्मा के औपनिषदिष्ठ तत्त्वज्ञान का स्फुट आविर्भाव हुआ। उपनिषदों के ज्ञान का पर्यवसान आत्मा और परमात्मा के एकीकरण को सिद्ध करने वाले प्रतिभामूलक वेदान्त में हुआ।

Q.भारतीय दर्शन का कौन सा मत ईश्वर में विश्वास नहीं करता है?

Ans.भारतीय दर्शन में नास्तिक शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। (1) जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं और ये तीनों दर्शन ईश्वर या वेदों पर विश्वास नहीं करते इसलिए वे नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं।

Q.भारतीय दर्शन की संख्या प्रणाली के संस्थापक कौन थे?

Ans. विचार वैशेषिक स्कूल की स्थापना 6 वीं शताब्दी ई. पू. में कपिल मुनि द्वारा की गयी थी।

Q.भारतीय दर्शन के अनुसार व्यक्तित्व कितने प्रकार के होते है *?

Ans.

  • भारतीय दृष्टिकोण भारतीय दर्शन में व्यक्तित्व तीन प्रकार के बतलाये हैं- सतोगुणी …
  • शरीर-रचना का दृष्टिकोण शरीर-रचना के आधार पर विभिन्न विद्वानों ने व्यक्तित्व के अलग-अलग प्रकार बतलाये हैं-
  • अन्तर्मुखी व्यक्तित्व (INTROVERT PERSONALITY) …
  • बहिर्मुखी व्यक्तित्व (EXTROVERT PERSONALITY)

Q.भारतीय दर्शन में ज्ञान क्या है?

Ans.भारतीय चार्वाक मत इस प्रकार के ज्ञान को ‘ज्ञान’ मानता है क्योंकि इस मत के अनुसार जो जगत हमारे सामने है वही सत्य है। वर्तमान यथार्थवादी दार्शनिक और वैज्ञानिक भी प्रत्यक्ष ज्ञान मानते हैं। परोक्ष ज्ञान वह है जो हमें दूसरों से उनके कथनों या पुस्तकों द्वारा प्राप्त होता हैं।

Q.भारतीय दर्शन क्या सिखाता है?

Ans.भारतीय दर्शन सिखाता है कि जीवन का एक आशय और लक्ष्य है। उस आशय की खोज हमारा दायित्व है और अंत में उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेना हमारा विशेष अधिकार है।

Q.भारतीय दर्शन के लेखक कौन है?

Ans.सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Q.भारतीय दर्शन का कौन सा संप्रदाय परमाणु वाद का प्रतिपादन करता है?

Ans.वैशेषिक में चार भूतों के चार तरह के परमाणु माने हैं — पृथ्वी परमाणु, जल परमाणु, तेज परमाणु और वायु-परमाणु।

Q.भारतीय दर्शन के अनुसार कर्म नियम का मार्गदर्शन और नियंत्रक कौन हैं?

Ans.वह पुरूष को चैतन्य मानता है। सर्वप्रथम सांख्य दर्शन ही कर्म फल व्यवस्था को स्वीकार करता है। सांख्य के अनुसार कर्म का फल स्वतः मिलता है क्योंकि सांख्य दर्शन ईश्वर को कर्मफल दाता के रूप में नहीं मानता और कर्म नियम का पूर्व जन्म से अटूट सम्बन्ध स्वीकार करता है।

Q.भारतीय दर्शन की संख्या प्रणाली के संस्थापक कौन थे?

Ans.विचार वैशेषिक स्कूल की स्थापना 6 वीं शताब्दी ई. पू. में कपिल मुनि द्वारा की गयी थी।

Q.भारतीय दर्शनों में आस्तिक शब्द कितने अर्थों में प्रयुक्त हुआ है?

Ans.आस्तिक दर्शन छ: हैं जिन्हें न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त कहा जाता है। इनके विपरीत चावार्क, बौद्ध और जैन दर्शनों को ‘नास्तिक दर्शन’ के वर्ग में रखा जाता है।

Q.भारतीय दर्शन का कौन सा मत ईश्वर में विश्वास नहीं करता है?

Ans.भारतीय दर्शन में नास्तिक शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। (1) जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं और ये तीनों दर्शन ईश्वर या वेदों पर विश्वास नहीं करते इसलिए वे नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं।

Q.भारतीय दर्शन के अनुसार कर्म नियम का मार्गदर्शन और नियंत्रक कौन हैं?

Ans.वह पुरूष को चैतन्य मानता है। सर्वप्रथम सांख्य दर्शन ही कर्म फल व्यवस्था को स्वीकार करता है। सांख्य के अनुसार कर्म का फल स्वतः मिलता है क्योंकि सांख्य दर्शन ईश्वर को कर्मफल दाता के रूप में नहीं मानता और कर्म नियम का पूर्व जन्म से अटूट सम्बन्ध स्वीकार करता है।

Q.भारतीय दर्शन की प्रारंभिक शाखा कौन सी है?

Ans.वैदिक दर्शनों में षड्दर्शन (छः दर्शन) अधिक प्रसिद्ध और प्राचीन हैं। ये छः दर्शन ये हैं- न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त।

Q.भारतीय दर्शन में आत्मा का स्वरूप क्या है?

Ans.आत्मा को ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता माना गया है। मीमांसा भि न्याय–वैशेषिक की तरह चेतना को आत्मा का आगुन्तक धर्म मानती है। मीमांसा दर्शन में आत्मा को नित्य एवं विभु माना गया है। सांक्य ने आत्मा को चैतन्य स्वरूप माना है।

Q.भारतीय दर्शन का कौन सा मत ईश्वर में विश्वास नहीं करता है?

Ans.भारतीय दर्शन में नास्तिक शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। (1) जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं और ये तीनों दर्शन ईश्वर या वेदों पर विश्वास नहीं करते इसलिए वे नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं।

Q.भारतीय दृष्टि से ज्ञान क्या है?

Ans.इसी सोच विचारों की क्षमता या शक्ति को हम ज्ञान कहते है, जिसके आधार पर हम सभी प्रकार के कार्यों को करते है एवं निरन्तर आगे बढ़ते है अर्थात उन्नति करते है, यह उन्नति तरक्की और आगे बढ़ने की शक्ति ही व्यक्ति को और आगे बढ़ाने और अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देती है जिससे वह सदैव सत्कर्म एवं निरन्तर उचित कार्य करता है

Q.भारतीय दार्शनिकों के चिंतन के कितने आयाम हैं?

Ans.इसमें मूल स्वर प्राचीनता से पुनः जुड़ाव का हैं. क्योंकि वैचारिक आयाम भारत को उसकी प्रामाणिक अर्थवता प्रदान करते हैं. ये आयाम भारतीय अस्मिता व अस्तित्व का हैं. कौटिल्य, मनु, व्यास और अन्य कथित प्राचीन विचारक उन विचारों तथा भारतीय दर्शन प्रक्रिया का करते है जो परवर्ती काल में बार बार मुखरित होती हैं.

Q.कौन सा राज्य दार्शनिक ज्ञान का एक अग्रणी क्षेत्र माना जाता था?

Ans.काशी राज्य दार्शनिक ज्ञान का एक अग्रणी माना जाता है।

Q.भारतीय दर्शन के जनक कौन हैं?

Ans.विशिष्ट अनुशासन और विज्ञान के रूप में दर्शन को प्लेटो ने विकसित किया था। उसकी उत्पत्ति दास-स्वामी समाज में एक ऐसे विज्ञान के रूप में हुई जिसने वस्तुगत जगत तथा स्वयं अपने विषय में मनुष्य के ज्ञान के सकल योग को ऐक्यबद्ध किया था।

Q.भारतीय दर्शन के अनुसार कर्म नियम का मार्गदर्शन और नियंत्रक कौन हैं?

Ans.वह पुरूष को चैतन्य मानता है। सर्वप्रथम सांख्य दर्शन ही कर्म फल व्यवस्था को स्वीकार करता है। सांख्य के अनुसार कर्म का फल स्वतः मिलता है क्योंकि सांख्य दर्शन ईश्वर को कर्मफल दाता के रूप में नहीं मानता और कर्म नियम का पूर्व जन्म से अटूट सम्बन्ध स्वीकार करता है।

Q.भारतीय दर्शन का कौन सा संप्रदाय परमाणु वाद का प्रतिपादन करता है?

Ans.वैशेषिक दर्शन

वैशेषिक में चार भूतों के चार तरह के परमाणु माने हैं — पृथ्वी परमाणु, जल परमाणु, तेज परमाणु और वायु-परमाणु

Q.भारतीय दर्शन का कौन सा मत ईश्वर में विश्वास नहीं करता है?

Ans.भारतीय दर्शन में नास्तिक शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। (1) जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं और ये तीनों दर्शन ईश्वर या वेदों पर विश्वास नहीं करते इसलिए वे नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं।

Q.परमाणु शब्द एक भारतीय दार्शनिक ने दिया था उसका नाम क्या है?

Ans.महर्षि कणाद है